लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पारित, 288 वोट समर्थन में और 232 विरोध में पड़े।

नई दिल्ली। वक्फ संशोधन विधेयक 2024 लोकसभा से पारित हो गया है। इसे बुधवार को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन में प्रस्तुत किया, जिस पर करीब 12 घंटे तक चर्चा हुई। अब यह विधेयक राज्यसभा में भेजा जाएगा। एनडीए की सहयोगी पार्टियों टीडीपी और जेडीयू ने इसका समर्थन किया।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सर्वोपरि है, और यहां वे इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि देश का बहुसंख्यक समुदाय धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखता है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि सरकार वक्फ बोर्ड के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर रही है और मुतवल्लियों के अधिकारों को बरकरार रखा गया है।

वक्फ क्या है?

वक्फ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है ‘संरक्षित करना’। इस्लामी परंपरा के अनुसार, वक्फ संपत्तियों को जनकल्याण के लिए दान किया जाता है और इनका उपयोग धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

भारत में वक्फ का इतिहास

भारत में वक्फ की परंपरा इस्लाम के आगमन के साथ शुरू हुई। 12वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी ने मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गांव दान किए, जिसे भारत में वक्फ की पहली मिसाल माना जाता है। बाद में दिल्ली सल्तनत और मुगल शासकों ने इसे और बढ़ावा दिया। अकबर के समय वक्फ संपत्तियों के प्रशासन को अधिक संगठित किया गया। ब्रिटिश शासन में 1913 में इसे कानूनी मान्यता दी गई और 1923 में वक्फ अधिनियम पारित किया गया। स्वतंत्रता के बाद इसे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अंतर्गत रखा गया। आज भारतीय रेलवे और सेना के बाद वक्फ बोर्ड देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार है।

मौजूदा स्थिति और चिंताएँ

इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार, वक्फ संपत्तियों के अनुचित प्रबंधन के कारण कई जगहों पर इनका दुरुपयोग हुआ है। वहीं, मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का मानना है कि वक्फ एक धार्मिक परंपरा रही है, जिसे गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार के संशोधनों को लेकर कुछ हलकों में चिंता है कि कहीं इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करना तो नहीं।

भविष्य की दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि वक्फ संपत्तियों का सही प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक सुधार आवश्यक हैं। सरकार और समुदाय के बीच संतुलन बनाए रखना इस ऐतिहासिक परंपरा की मूल भावना को संरक्षित रखने के लिए जरूरी होगा।

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