सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को पश्चिम बंगाल में काउंटिंग सेंटर्स पर केंद्रीय और पीएसयू (PSU) कर्मचारियों की तैनाती के खिलाफ TMC की आपत्ति को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘चुनाव आयोग को कोई आदेश नहीं दे सकते है। यह चुनाव आयोग का अधिकार है उन पर भरोसा करें।’ TMC की ओर से सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कहा है कि हमें उनसे (चुनाव आयोग) से न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है।
TMC ने इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने आपत्ति खारिज करते हुए कहा था कि काउंटिंग स्टाफ की नियुक्ति चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसमें कोई अवैधता नहीं है।
बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो फेज में चुनाव हुए हैं। रिजल्ट 4 मई को आएगा।

पहले पूरा मामला समझें
चुनाव आयोग ने 13 अप्रैल को एक सर्कुलर जारी किया था जिसके अनुसार मतगणना की हर टेबल पर सुपरवाइजर या असिस्टेंट में से कम से कम एक कर्मचारी केंद्र सरकार या पब्लिक सेक्टर (PSU) का होना अनिवार्य है।
टीएमसी का आरोप है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी बीजेपी के प्रभाव में काम कर सकते हैं। इसलिए राज्य सरकार के कर्मचारियों की भी नियुक्ति की जाए। टीएमसी ने यह शिकायत चुनाव आयोग से भी की थी।
कोर्ट रूम LIVE
कपिल सिब्बल: इससे जुड़े 4 मुद्दे हैं-
पहला: 13 अप्रैल को जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) को नोटिस जारी किया गया लेकिन हमें इसकी जानकारी 29 तारीख को मिली।
दूसरा: उन्हें पहले से ही आशंका है कि हर बूथ पर गड़बड़ी होगी। सवाल यह है कि उन्हें यह अंदाजा या जानकारी कहां से मिली? यह बेहद चौंकाने वाली बात है।
तीसरा: मुद्दा यह है कि पहले से ही हर टेबल पर केंद्र सरकार का एक अधिकारी (माइक्रो ऑब्जर्वर) मौजूद है। ऐसे में सवाल है कि फिर एक और केंद्रीय अधिकारी की जरूरत क्यों पड़ रही है?
चौथा: मुद्दा यह है कि सर्कुलर में यह भी लिखा है कि एक राज्य सरकार का अधिकारी भी होना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकार के प्रतिनिधि को नियुक्त नहीं किया जा रहा है।
कपिल सिब्बल: हर टेबल पर एक केंद्रीय कर्मचारी की अनिवार्यता से चुनाव आयोग की मंशा समझ नहीं आती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा
![]()
आइए, हम इस प्रावधान को दोबारा पढ़ते हैं। यदि हम यह मान लें कि काउंटिंग सुपरवाइजर और सहायक केंद्र सरकार के कर्मचारी होंगे, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रावधान में स्पष्ट है कि इनकी नियुक्ति राज्य या केंद्र, किसी भी पूल से की जा सकती है।![]()
कपिल सिब्बल : मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) के पत्र में कहा गया है कि मतगणना में गड़बड़ी की आशंका जताई गई है। यह सीधे तौर पर राज्य सरकार पर उंगली उठाने जैसा है। अगर ऐसी आशंका है, तो उसका कोई ठोस डेटा होना चाहिए। हर बूथ के लिए यह आशंका कहां से आई? यह जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? अगर केंद्र सरकार के अधिकारियों को लगाया जा रहा है, तो हमें पहले से बताया क्यों नहीं गया?
जस्टिस बागची : इसमें राजनीतिक दलों की सहमति लेने का सवाल ही कहां आता है? नियमों के अनुसार, काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट या तो केंद्र सरकार के हो सकते हैं या राज्य सरकार के। जब यह विकल्प खुला है तो नोटिफिकेशन को नियमों के खिलाफ नहीं कहा जा सकता। यह भी संभव है कि दोनों अधिकारी केंद्र सरकार के ही हों।
सिब्बल: सर्कुलर में ऐसा स्पष्ट नहीं लिखा है।
चुनाव आयोग के सीनियर एडवोकेट डीएस नायडू: रिटर्निंग ऑफिसर राज्य सरकार के कैडर का अधिकारी हैं। रिटर्निंग ऑफिसर के पास पूरी जिम्मेदारी और अधिकार होता है। हर उम्मीदवार के पास अपना-अपना काउंटिंग एजेंट भी होता है, जो पूरी प्रक्रिया पर नजर रखता है। इसलिए किसी भी गड़बड़ी की जो आशंका जताई जा रही है, वह पूरी तरह गलत और बेबुनियाद है।
सुप्रीम कोर्ट: यहां एक गलतफहमी है। यह मानना सही नहीं है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के कर्मचारी अलग-अलग तरह के होते हैं। दरअसल, दोनों ही सरकारी कर्मचारी हैं।
जस्टिस बागची: दोनों (काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट) केंद्र सरकार के अधिकारी भी हो सकते हैं। अगर ऐसा सर्कुलर में साफ लिखा भी होता, तब भी इसमें कोई गलती नहीं होती,
क्योंकि नियम कहते हैं कि केंद्र या राज्य, किसी भी सरकार के अधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं। सिर्फ एक ही समूह (जैसे केवल केंद्र सरकार) से अधिकारियों का चयन करना भी गलत नहीं है। यहां अनुपात वाली बात कहां से आ रही है।
ऑर्डर: 13 अप्रैल 2026 का चुनाव आयोग की तरफ से जारी सर्कुलर ही लागू रहेगा। अलग से कोई आदेश जारी करने की जरूरत नहीं है।
बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी बोले- नियुक्ति का अधिकार EC को
कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले पर पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा है कि सी राजनीतिक दल को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि काउंटिंग में किसे शामिल किया जाए। यह पूरी प्रक्रिया रिटर्निंग ऑफिसर के अधिकार में आती है।

