बार-बार क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम? 11 दिनों में 7 रुपये की बढ़ोतरी; पूरी डिटेल

नई दिल्ली। भारतीय परिवारों पर महंगाई का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। सब्जियों, खाद्य तेलों और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों ने रसोई के बजट को पहले ही बिगाड़ रखा है। इस बीच, आर्थिक बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में एक और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

सोमवार को ईंधन की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी की गई, जो पिछले 11 दिनों में चौथी वृद्धि है। इसके बावजूद, देश की तीन सरकारी तेल विपणन कंपनियां इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड पेट्रोल और डीजल के दामों में हालिया बढ़ोतरी के बाद भी भारी वित्तीय घाटे से जूझ रही हैं।

11 दिनों में ₹7 से ज्यादा की बढ़ोतरी

पिछले 11 दिनों के भीतर कई चरणों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल ₹7 प्रति लीटर से अधिक की वृद्धि की जा चुकी है। यह बढ़ोतरी अलग-अलग चरणों में हुई। जिसमें पहले ₹3, फिर 90 पैसे, उसके बाद 87 पैसे और हाल ही में ₹2.61 प्रति लीटर बढ़ी है। हालांकि, वित्तीय बाजार के अनुमानों के अनुसार, यह बढ़ोतरी तेल कंपनियों के घाटे को पाटने के लिए काफी नहीं है।

कच्चे तेल की खरीद और रिफाइनिंग का खर्च और रिटेल सेलिंग प्राइस के बीच के अंतर को खत्म करने और पुराने घाटे की पूरी भरपाई करने के लिए, सैद्धांतिक रूप से ईंधन की कीमतों में ₹28 से ₹33 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की आवश्यकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि हालिया बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियों को पिछले कुछ महीनों में हुए नुकसान की भरपाई के लिए प्रति लीटर कम से कम ₹20 और बढ़ाने की जरूरत होगी।

हालांकि, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से एक बार में इतनी बड़ी बढ़ोतरी होना नामुमकिन सा लगता है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में टुकड़ों-टुकड़ों में कीमतों का बढ़ना तय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हालिया मूल्य संशोधन से पहले तेल कंपनियों पर असाधारण दबाव बन चुका था।

74 दिनों तक कीमतों पर कंट्रोल से ₹1.2 लाख करोड़ का घाटा

28 फरवरी से शुरू हुए ईरान संकट के बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। इस संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम तेजी से बढ़े, जिससे कच्चे तेल का आयात और ईंधन को रिफाइन करना काफी महंगा हो गया। इसके बावजूद, भारत में लगातार 74 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखा गया था।

इसका नतीजा यह हुआ कि तेल कंपनियां महंगे दामों पर कच्चा तेल खरीद रही थीं, लेकिन घरेलू बाजार में इसे पुराने और सस्ते रेट पर बेच रही थीं। यह रोक जितनी लंबी खिंची, कंपनियों का वित्तीय घाटा उतना ही गहरा होता गया।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के ठीक बाद जब पहली बार कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा की गई, तब तक तीनों सरकारी तेल कंपनियों का संचयी घाटा ₹1.2 लाख करोड़ को पार कर चुका था।

यह संकट इसलिए भी ज्यादा गंभीर था क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर होने वाली कोई भी भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तौर पर भारत के आयात बिल और ईंधन के अर्थशास्त्र को प्रभावित करती है।

तेल कंपनियों को थोड़ी राहत

हालिया बढ़ोतरी से तेल कंपनियों का दैनिक घाटा कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विश्लेषकों के अनुसार, ईंधन के मार्केटिंग मार्जिन में प्रति 50 पैसे की बढ़ोतरी से तेल कंपनियों की ब्याज, टैक्स और मूल्यह्रास से पहले की कमाई में लगभग 7 से 11% तक का सुधार होता है। यही कारण है कि ईंधन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी कंपनियों के मुनाफे को तेजी से बढ़ाती है।

उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, जब कच्चे तेल की कीमतें अपने चरम पर थीं, तब ये कंपनियां सामूहिक रूप से हर दिन लगभग ₹1,600 करोड़ का नुकसान उठा रही थीं। सरकार ने आखिरकार धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने की अनुमति दी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में आई तेजी के मुकाबले भारत में दरों के बढ़ने की रफ्तार काफी धीमी रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार से मिली मामूली राहत

इस बीच, सोमवार को एक राहत की खबर भी आई। ईरान और अमेरिका के बीच संभावित राजनयिक समझौते की उम्मीदों के चलते वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 5% की गिरावट दर्ज की गई। बाजारों को उम्मीद है कि भू-राजनीतिक तनाव कम होने से तेल आपूर्ति मार्ग स्थिर हो सकते हैं और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में रुकावट का डर कम हो सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें नरम बनी रहती हैं, तो भारतीय ईंधन कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।

हालांकि, विश्लेषकों ने आगाह किया है कि अगर कोई राजनयिक समाधान निकल भी आता है, तो भी सप्लाई चेन और शिपिंग रूट को सामान्य होने में समय लगेगा। बीमा प्रीमियम, माल ढुलाई लागत और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण निकट भविष्य में कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रह सकते हैं।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

इस स्थिति ने देश के नीति निर्माताओं को एक बेहद मुश्किल मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां उन्हें दो विपरीत प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना है। ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर परिवहन लागत को बढ़ाती हैं, जिससे अंततः भोजन, उपभोक्ता सामानों और सेवाओं के दाम बढ़ जाते हैं और आम जनता पर बोझ पड़ता है।

दूसरी तरफ सरकारी तेल कंपनियां हैं, जो अपने निवेश प्लान, बैलेंस शीट और भविष्य की आपूर्ति स्थिरता को प्रभावित किए बिना अनिश्चित काल तक इस घाटे को खुद सहन नहीं कर सकतीं। फिलहाल, उपभोक्ताओं को बड़ी मूल्य वृद्धि से जो राहत मिली है, वह शायद अस्थायी है। क्योंकि प्रति लीटर ₹7.38 की बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियों के घाटे का गणित अभी तक पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।

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