अंबाला में 220 फीट गहरे बोरवेल में गिरते ही थम गई थीं मासूम की सांसें, 20 घंटे बाद मिला शव; तीन पर केस दर्ज

अंबाला। धन्योड़ा गांव में मंगलवार सुबह सात बजे खुले बोरवेल में गिरे साढ़े तीन वर्षीय मासूम निरवैर सिंह उर्फ निर्भय की सांसें उसी समय थम गई थी। करीब 20 घंटे 25 मिनट तक चला रेस्क्यू आपरेशन आखिरकार उसकी जिंदगी नहीं बचा सका।

बुधवार अलसुबह तीन बजकर 25 मिनट पर बाहर निकाला गया। सुबह करीब सवा चार बजे उसे नागरिक अस्पताल पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों के दो सदस्यीय चिकित्सकीय पैनल ने पोस्टमार्टम किया। रिपोर्ट के अनुसार बोरवेल में डूबने और गंभीर चोटों के कारण मौत हुई। उसके सिर, छाती और दोनों टखनों पर गंभीर चोटें लगीं, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों ने काम करना बंद कर दिया।

डॉक्टरों के अनुसार, निरवैर के सिर और छाती पर काफी जगह गंभीर चोटें थीं, जिसने शरीर के मुख्य अंगों को ठप कर दिया। गिरने के प्रभाव के कारण दोनों टखनों पर गहरी चोटें आईं। डॉक्टरों के पैनल के अनुसार बोरवेल में गिरने के कुछ ही समय के भीतर निरवैर की सांसें थम चुकी थीं।

बारिश के बीच अंतिम संस्कार में उमड़ा पूरा गांव

जैसे ही मासूम निरवैर का शव दोपहर बार घर पहुंचा, पूरे गांव में मातम छा गया। चीख-पुकार मच गई। माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था, जबकि लगातार हो रही बारिश के बीच गांव का हर व्यक्ति अंतिम यात्रा में शामिल हुआ। श्मशान घाट में प्रार्थना के बाद पिता मंजीत सिंह ने अपने इकलौते बेटे को मुखाग्नि दी।

पूरी रात बोरवेल के पास बैठा रहा दादा

रेस्क्यू आपरेशन के दौरान बच्चे की मां और पिता सदमे में बार-बार बेहोश होते रहे। वहीं दादा पूरी रात बोरवेल के पास टकटकी लगाए बैठे रहे और हर पल इस उम्मीद में रहे कि पोता सकुशल बाहर आ जाएगा, लेकिन सुबह होते-होते यह उम्मीद भी टूट गई।

खेत मालिक समेत तीन लोगों पर मामला दर्ज

घटना के बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। उपायुक्त अजय सिंह तोमर के निर्देश पर अंबाला शहर सदर थाना पुलिस ने खेत मालिक हरनेक सिंह और ठेके पर लेने वाले दिलप्रीत सिंह और बलजीत सिंह के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार खेत हरनेक सिंह के नाम है, जिसे आगे ठेके पर दिया गया था। मालिक विदेश में रहता है।

मां की गोद हुई सूनी, पिता-चाचा के कंधों पर अंतिम यात्रा

जिस घर में साढ़े तीन साल पहले बच्चे की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ सिसकियां थीं। निरवैर का शव देख मां बेसुध हो गई। उसकी चीखें सुन लोगों की आंखें भर आईं। पिता की आंखों से आंसू कम और चेहरे पर दर्द ज्यादा दिखाई दे रहा था। वह कभी बेटे को निहारते, तो कभी खामोश होकर जमीन की ओर देखने लगते। अंतिम संस्कार के समय कांपते हाथों और रूंधे गले से उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को मुखाग्नि दी। दादा की हालत भी किसी से देखी नहीं जा रही थी।

बंद नहीं किया जानलेवा बोरवेल

जिस खुले बोरवेल ने निरवैर की जान ली, उसे हादसे के बाद भी पूरी तरह बंद नहीं किया गया। दोपहर तक बरसात होती रही और पूरा गांव बच्चे के अंतिम संस्कार में रहा। इसे अस्थायी बंदोबस्त कर सिर्फ प्लाई बोर्ड से ढक दिया गया।

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