
बादशाहपुर। साइबर सिटी को 51 वर्ष बाद आधुनिक सुविधाओं और न्यायिक अधोसंरचना के रूप में बहुप्रतीक्षित टावर ऑफ जस्टिस मिलने जा रहा है। 12 जुलाई को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इस भव्य न्यायालय परिसर का उद्घाटन करेंगे।
समारोह को गरिमामय, सुव्यवस्थित और यादगार बनाने के लिए जिला प्रशासन, जिला न्यायपालिका तथा जिला बार एसोसिएशन युद्धस्तर पर तैयारियों में जुटे हैं। सुरक्षा, यातायात, पार्किंग, अतिथि स्वागत, बैठक व्यवस्था और स्वच्छता सहित सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
जिला अदालत का इतिहास रहा काफी महत्वपूर्ण
जिला अदालत का इतिहास भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। जिस अदालत परिसर में अभी अदालत चल रही है। उस भवन का निर्माण 1975 में हुआ था। जहां शुरुआती दौर में गिनी-चुनी अदालतों से न्यायिक कार्य शुरू हुआ।
समय के साथ तेजी से विकास, बढ़ती आबादी और मुकदमों की संख्या में लगातार वृद्धि के कारण अदालतों का विस्तार होता गया। आज जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में सेशन और सिविल न्यायालयों सहित करीब 70 अदालतें संचालित हो रही हैं।
1975 में बना भवन अब जर्जर हो चुका
1975 में बना भवन अब पूरी तरह जर्जर हो चुका है। बढ़ते न्यायिक कार्यभार के अनुरूप अपर्याप्त साबित हो रहा था। कार्यभार के अनुरूप न होने के कारण कुछ अदालतें मिनी सचिवालय के साथ लगते भवन में और कुछ आदतें विकास सदन में भी चलाई जा रही हैं।
जिला की न्यायिक व्यवस्था का इतिहास छह दशक से अधिक पुराना है। 4 सितंबर 1959 को बसंत लाल मल्होत्रा की अध्यक्षता में वरिष्ठ उप न्यायाधीश (सीनियर सब जज) की अदालत स्थापित हुई।
इसके बाद पहली अप्रैल 1965 को हरि प्रकाश की अध्यक्षता में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत शुरू हुई। शुरुआत में न्यायिक कार्य पुराने न्यायालय परिसर सिविल लाइंस से संचालित होता रहा।
1975 में सभी अदालतों को नए न्यायालय भवन में स्थानांतरित किया गया। जो अब 51 वर्ष बाद जर्जर हो चुका है। इसी परिसर में जिला अदालत चल रही है। इसके अलावा जिला में पटौदी और सोहना सब डिविजनल अदालत है। इसी पुराने परिसर की जगह आधुनिक टावर आफ जस्टिस न्यायिक व्यवस्था के नए युग की शुरुआत करेगा।

