
गुरुग्राम। एक खिलाड़ी सालभर मैदान पर पसीना बहाता है। जीत के लिए दिन-रात मेहनत करता है, लेकिन जब राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में खेलने का मौका आता है और विभागीय लापरवाही के कारण उसे मैदान में उतरने ही न दिया जाए तो उसकी पीड़ा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
गुरुग्राम में शिक्षा विभाग की ऐसी ही लापरवाही ने अंडर-17 लड़कियों की फुटबाल टीम को राज्य स्तरीय प्रतियोगिता से बाहर कर दिया। हैरानी की बात यह है कि मामले में जिम्मेदारी तय करने के बजाय विभागीय अधिकारी बोलने से बच रहे हैं।
हिसार में 16 से 18 अगस्त तक राज्य स्तरीय स्कूली अंडर-17 लड़कियों की फुटबाल (प्री-सुब्रतो) प्रतियोगिता आयोजित हुई थी। इसमें भाग लेने के लिए गांव नखरोला स्थित सरकारी स्कूल की टीम गुरुग्राम से हिसार पहुंची, लेकिन खिलाड़ियों के जरूरी दस्तावेजों की हार्ड कापी टीम के साथ नहीं भेजी गई।
दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण टीम को प्रतियोगिता में खेलने की अनुमति नहीं मिली। प्रतियोगिता आयोजन के प्रभारी शिव शक्ति बेनीवाल ने बताया कि विभागीय नियमों के अनुसार प्रत्येक जिला टीम को खिलाड़ियों के दस्तावेजों की तीन हार्ड कापी साथ लानी होती हैं।
गुरुग्राम की टीम हार्ड कॉपी लेकर नहीं पहुंची थी। टीम को एक दिन का समय भी दिया गया, लेकिन आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि आनलाइन पंजीकरण का रिकार्ड उनके पास उपलब्ध नहीं होता, यह सुब्रतो कप से संबंधित पोर्टल पर रहता है।
जिम्मेदारी से बचने की कोशिश
सवाल यह है कि जब खंड स्तर से लेकर जिला और फिर राज्य स्तर तक टीम का चयन पूरी प्रक्रिया के तहत होता है, तो दस्तावेज तैयार कराने और उनकी हार्ड कॉपी टीम के साथ भेजने की जिम्मेदारी किसकी थी। विभाग की ओर से अब यह तर्क दिया जा रहा है कि सभी खिलाड़ियों का आनलाइन पंजीकरण था और संबंधित लोगों को हार्ड कापी भेजने की जानकारी नहीं थी।
नियमों के मुताबिक खंड स्तर पर विजेता टीम जिला स्तरीय प्रतियोगिता में पहुंचती है और जिला विजेता टीम को ही राज्य स्तर पर खेलने का अधिकार मिलता है। ऐसे में खिलाड़ियों के दस्तावेजों की जांच और उन्हें समय पर उपलब्ध कराना संबंधित पीटीआई और स्कूल प्रधानाचार्य की जिम्मेदारी बनती है। सवाल यह भी है कि इतनी महत्वपूर्ण प्रतियोगिता के लिए टीम रवाना करने से पहले जिला शिक्षा विभाग ने दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं की?
खिलाड़ियों की मेहनत पर भारी पड़ी लापरवाही
पूरे मामले में सबसे बड़ा नुकसान उन छात्राओं का हुआ, जिन्होंने मैदान पर मेहनत कर टीम को राज्य स्तर तक पहुंचाया। अब विभागीय चूक के कारण उनके हाथ केवल निराशा लगी है। जिला शिक्षा विभाग के अधिकारियों से इस संबंध में जवाब मांगा गया, लेकिन कोई भी अधिकारी जिम्मेदारी लेने या मामले पर स्पष्ट जवाब देने को तैयार नहीं है। यह स्थिति विभाग की कार्यप्रणाली और खिलाड़ियों के प्रति उसकी संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

