मरे हुए परिजनों को खिलाते हैं खाना, करते हैं बात; पढ़ें तोराजा समुदाय की रोंगटे खड़े करने वाली परंपरा

नई दिल्ली। सोचिए, घर में किसी की मृत्यु हो जाए और परिवार वाले उसे दफनाने या जलाने की बजाय, उसे खाना खिलाएं, उसके कपड़े बदलें और उससे बिल्कुल वैसे ही बातें करें जैसे वह जिंदा हो! सुनने में यह किसी अजीब लगेगा, लेकिन इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप पर यह आम जिंदगी का हिस्सा है।

दुनिया भर में जहां मौत पर आंसू बहाए जाते हैं, वहीं तोराजा समुदाय के लिए मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि परलोक की ओर जाने वाले एक शानदार सफर की शुरुआत है। आइए इस हैरान कर देने वाली परंपरा के बारे में जानते हैं।

मौत नहीं, सिर्फ एक बीमारी

तोराजा संस्कृति में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसे तुरंत मृत नहीं माना जाता। जब तक परिवार एक भव्य अंतिम संस्कार का आयोजन करने के लिए पैसा नहीं जुटा लेता, तब तक उस व्यक्ति को केवल मकूला यानी एक बीमार व्यक्ति माना जाता है।

हैरान करने वाली बात यह है कि मृतक का शरीर महीनों और कभी-कभी सालों तक परिवार के साथ घर में ही रखा जाता है। परिवार के सदस्य उन्हें रोजाना खाना और पानी परोसते हैं, उनकी देखभाल करते हैं और उनसे बातें भी करते हैं। शरीर को सुरक्षित रखने के लिए उसे खास जड़ी-बूटियों से संरक्षित किया जाता है।

राम्बू सोलो- एक भव्य उत्सव

तोराजा समुदाय में अंतिम संस्कार कोई निजी शोक सभा नहीं, बल्कि एक विशाल सामाजिक उत्सव है जिसे राम्बू सोलो कहा

जाता है। यह उत्सव तीन से दस दिनों तक चलता है, जिसमें पूरा गांव और दूर-दराज से आए रिश्तेदार शामिल होते हैं।

इस समारोह का सबसे अहम हिस्सा है भैंसों की बलि। तोराजा लोगों का मानना है कि भैंसे वे वाहन हैं, जो मृतक की आत्मा को पुया यानी परलोक तक ले जाते हैं। बलि दिए जाने वाले भैंसों की संख्या मृतक की सामाजिक स्थिति को भी  दिखाती है। अमीरों और कुलीन वर्ग के अंतिम संस्कार में दर्जनों भैंसों की बलि दी जाती है।

चट्टानों में कब्र और ‘ताऊ-ताऊ’ पुतले

(Picture Courtesy: Instagram)

तोराजा लोगों के दफनाने के तरीके भी सामान्य कब्रिस्तानों से बिल्कुल अलग हैं। शवों को जमीन के नीचे दफनाने के बजाय चूना पत्थर की ऊंची चट्टानों को काटकर उनमें ताबूत में रखे जाते हैं। कई ताबूतों को प्राकृतिक गुफाओं के भीतर सजाया जाता है।

चट्टानों की बालकनी पर मृतक के जैसे दिखने वाले लकड़ी के आदमकद पुतले रखे जाते हैं। ये पुतले कब्रों की रखवाली करते हैं और माना जाता है कि ये पूर्वजों का आशीर्वाद परिवार पर बनाए रखते हैं।

खर्च और आपसी सहयोग

एक भव्य राम्बू सोलो समारोह की लागत काफी ज्यागा होती है। इस भारी खर्च को उठाने के लिए परिवार आपसी सहयोग पर निर्भर रहता है। रिश्तेदार और समुदाय के लोग धन, भैंस और सूअर दान करते हैं, ताकि मृतक को सम्मानजनक विदाई दी जा सके।

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