
बादशाहपुर। साइबर सिटी में बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद जमीनी तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली है। सेक्टरों में बिजली के खंभों पर तारों का जाल बना हुआ है। कई जगह मीटर और केबल बेतरतीब तरीके से लटक रहे हैं। वर्षा के दौरान इनसे हादसे का खतरा और बढ़ जाता है।
शहर में बिजली के खंभे पर बड़ी संख्या में तार लटकते दिखाई दे रहे हैं। कई मीटर खंभे पर एक के ऊपर एक लगाए गए हैं। तार नीचे तक झूल रहे हैं। खंभे के आसपास पानी भरा हुआ है। ऐसे में करंट उतरने की स्थिति में बड़ा हादसा हो सकता है।
दक्षिणी हरियाणा बिजली वितरण निगम ने सेक्टर-1 से 57 तक के 580 फीडरों को भूमिगत कर स्मार्ट बनाने की योजना बनाई थी। इसके लिए अलग-अलग कंपनियों को काम दिया गया। 29 सितंबर 2017 को विद्या टेलीलिंक को 148 फीडर का काम 255.80 करोड़ रुपये में दिया गया।
टाटा प्रोजेक्ट को 147 फीडर का काम 239.52 करोड़ रुपये में मिला। इसके बाद 28 नवंबर 2018 को टाटा प्रोजेक्ट को 166 फीडर का काम 354.86 करोड़ रुपये में दिया गया। 11 सितंबर 2019 को एलएंडटी को 119 फीडर का काम 285.50 करोड़ रुपये में मिला। इन चार टेंडरों की राशि 1,135.68 करोड़ रुपये है। पूरे स्मार्ट ग्रिड कार्यक्रम पर करीब 1,300 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है।
नियम के अनुसार कंपनियों को दो साल में काम पूरा करना था। विद्या टेलीलिंक और एलएंडटी के प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं। लेकिन टाटा प्रोजेक्ट के दोनों काम अभी तक अधूरे हैं। टीएसजीपी-8 में 166 फीडर तैयार किए जाने थे। इनमें 117 फीडर ही तैयार हो पाए हैं।
623 किलोमीटर केबल भूमिगत की जानी थी। इसमें 546 किलोमीटर केबल ही डाली गई है। 239.52 करोड़ रुपये वाले टीएसजीपी-6 में 147 फीडर तैयार करने थे। इनमें 133 फीडर तैयार हो चुके हैं। 129 फीडर चालू भी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद शहर के कई हिस्सों में खुले तार और अव्यवस्थित बिजली ढांचा सवाल खड़े कर रहा है।
स्थानीय निवासियों की आवाज
स्मार्ट ग्रिड के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद बिजली व्यवस्था पटरी पर नही है। हमारे आसपास खंभों पर तारों का जाल है। बारिश में पानी भरने के बाद डर बना रहता है। बिजली निगम को पहले खतरनाक जगहों को चिह्नित कर तार व्यवस्थित करने चाहिए। लोगों की सुरक्षा सबसे जरूरी है।
-दीपिका नारायण, सेक्टर-46मेरे हिसाब से इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी अगर बिजली के तार इसी तरह लटकते रहें तो यह गंभीर लापरवाही है। स्मार्ट ग्रिड का फायदा लोगों को दिखाई देना चाहिए। केवल कागजों में काम पूरा होना पर्याप्त नहीं है। निगम को अधूरे काम की जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।
-प्रवीण यादव, संयोजक, युनाइटेड गुरुग्राम आरडब्ल्यूएज
ट्रांसफार्मर की अर्थिंग नहीं है। कोई पार्क के किनारे लगा दिया। किसी ट्रांसफार्मर को कवर कर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। भूमिगत केबल डालने की योजना बनाई गई थी तो अभी कहीं कोई व्यवस्था नहीं हो सकी। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी खंभों पर तारों का बोझ है। बारिश के दिनों में हादसे की आशंका रहती है।
-आरके यादव, पूर्व अध्यक्ष आरडब्ल्यूए, सेक्टर-46
स्मार्ट ग्रिड के काम की सार्वजनिक रूप से प्रगति रिपोर्ट जारी की जाए। किस कंपनी ने कितना काम किया और कितना पैसा खर्च हुआ, इसकी जानकारी लोगों को मिलनी चाहिए। अधूरे काम को जल्द पूरा कराया जाए और खुले तारों को सुरक्षित किया जाए। आमजन की जिंदगी से खिलवाड़ न किया जाए।
-कुलदीप बोहरा, पूर्व नगर निगम पार्षद
- 255.80 करोड़ रुपये 2017 में विद्या टेलीलिंक को 148 फीडर भूमिगत करने का टेंडर
- 239.52 करोड़ रुपये 2017 में टाटा प्रोजेक्ट को 147 फीडर स्मार्ट बनाने का टेंडर
- 354.86 करोड़ रुपये 2018 में टाटा प्रोजेक्ट को 166 फीडर भूमिगत करने का टेंडर
- 285.50 करोड़ रुपये 2019 में एलएंडटी को 119 फीडर स्मार्ट बनाने का टेंडर
- 580 फीडर इस योजना के तहत किए जाने थे भूमिगत
- 2 साल में होना था प्रोजेक्ट पूरा आज 9 साल बाद भी पूरा नहीं
- 166 में से 117 फीडर तैयार हुए हैं टाटा प्रोजेक्ट के टेंडर में
- 623 में से 546 किलोमीटर केबल भूमिगत हो पाई

